- बिहार विधानसभा चुनाव 2025: भविष्य की राजनीति पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: भविष्य की राजनीति पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव
बिहार विधानसभा चुनाव 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025:बिहार भारत का वह राज्य जो हमेशा से राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र रहा है, एक बार फिर 2025 के विधानसभा चुनावों के माध्यम से देश की राजनीति को नई दिशा देने की तैयारी में है। 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है, जिसमें रिकॉर्ड 64.69 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो लोकतंत्र की जीवंतता को दर्शाता है। दूसरा चरण 11 नवंबर को होगा और 14 नवंबर को परिणाम घोषित होंगे।
यह चुनाव न केवल बिहार की 243 सीटों पर सत्ता का फैसला करेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-नीतीश कुमार गठबंधन (एनडीए), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन और प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज के बीच त्रिकोणीय संघर्ष के रूप में भविष्य की राजनीति को आकार देगा। बेरोजगारी, प्रवासी मजदूरों की समस्या, महिलाओं की सुरक्षा और विकास के मुद्दों पर केंद्रित यह चुनाव, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की कसौटी भी बनेगा।
चुनाव का पृष्ठभूमि और राजनीतिक परिदृश्य
बिहार की राजनीति हमेशा से जाति, गठबंधन और व्यक्तित्वों पर आधारित रही है। 2020 के चुनावों में एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन नीतीश कुमार के बार-बार गठबंधन बदलने ने राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया। 2022 में नीतीश ने फिर से महागठबंधन का साथ दिया, लेकिन 2024 में वापस एनडीए में लौट आए। अब 2025 के चुनावों में एनडीए (भाजपा और जेडीयू) के खिलाफ महागठबंधन (आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दल) तथा जन सुराज पार्टी का उभरना एक नया मोड़ है।
प्रशांत किशोर, जो पहले मोदी और नीतीश के लिए रणनीतिकार रहे, अब अपनी जन सुराज पार्टी के साथ 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर ‘तीसरा विकल्प’ पेश कर रहे हैं। उनके अभियान ने युवाओं को आकर्षित किया है, और पहले चरण के मतदान में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी ने संकेत दिया है कि बदलाव की हवा बह रही है। महागठबंधन के चेहरे तेजस्वी यादव ने ‘नई सरकार बनेगी’ का दावा किया है, जबकि भाजपा ने ‘जंगलराज’ के खिलाफ विकास का नारा दिया है।
यह चुनाव 74 मिलियन मतदाताओं के बीच हो रहा है, जहां 121 सीटों पर पहले चरण में शांतिपूर्ण मतदान हुआ। रिकॉर्ड वोटिंग ने अनुमान लगाया है कि क्या यह नीतीश कुमार को फायदा पहुंचाएगी या विपक्ष को मजबूत करेगी।
प्रमुख मुद्दे: बेरोजगारी से लेकर प्रवासी संकट तक
बिहार भारत का सबसे गरीब राज्य है, जहां बेरोजगारी दर 7.6 प्रतिशत से अधिक है। लाखों बिहारी प्रवासी मजदूर दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे शहरों में काम करते हैं, लेकिन कोविड-19 के बाद उनका संकट बढ़ गया। 2025 चुनावों में यह मुद्दा प्रमुख है – क्या नई सरकार प्रवासियों के लिए रोजगार सृजन कर पाएगी? तेजस्वी यादव ने ‘रोजगार और विकास’ का वादा किया, जबकि नीतीश ने महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण और सात निश्चय योजना का हवाला दिया।
महिलाओं की भूमिका निर्णायक है। पहले चरण में महिलाओं की कतारें लंबी दिखीं, जो एसआईआर (सुरक्षा, सम्मान, समृद्धि) जैसे मुद्दों पर संवेदनशील हैं। भाजपा ने आरजेडी पर ‘जंगलराज’ का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने एनडीए की विफलताओं को उजागर किया। इसके अलावा, जातिगत समीकरण – यादव, कुर्मी, कोइरी, मुस्लिम और ईबीसी – अभी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन युवा मतदाता विकास-केंद्रित हो रहे हैं।
जन सुराज का प्रवेश एक नया आयाम जोड़ता है। प्रशांत किशोर ने ‘पुरानी राजनीति को उखाड़ फेंकने’ का नारा दिया, और उनके रोड शो ने एनडीए-महागठबंधन दोनों को चिंतित किया। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व का सवाल है, जहां वे ‘कमजोर कड़ी’ की छवि से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।
अभियान और उम्मीदवार: मोदी का दांव और तेजस्वी की चुनौती
प्रधानमंत्री मोदी ने अररिया में सभा कर आरजेडी पर हमला बोला, जबकि तेजस्वी ने पटना से युवाओं को ललकारा। भाजपा की रणनीति जातिगत समीकरणों पर आधारित है, जहां वे जेडीयू के साथ मिलकर 40 प्रतिशत वोट शेयर की उम्मीद कर रहे हैं। दूसरी ओर, महागठबंधन 2020 की 110 सीटों को पार करने का लक्ष्य रखे हुए है।
जन सुराज के चार उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की घटना ने विवाद खड़ा किया, जो दर्शाता है कि नई पार्टी प्रमुख दलों के लिए खतरा बन गई है। कुल 1,314 उम्मीदवार मैदान में हैं, और पहले चरण के 121 सीटों पर 64.66 प्रतिशत वोटिंग ने उत्साह दिखाया।
भविष्य की राजनीति पर प्रभाव: राष्ट्रीय परिदृश्य में बदलाव
यह चुनाव बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। यदि एनडीए जीतता है, तो मोदी सरकार को 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले मजबूती मिलेगी, खासकर हिंदी पट्टी में। बिहार 40 लोकसभा सीटें भेजता है, जो विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण हैं। विपक्ष की हार से इंडिया गठबंधन कमजोर होगा, जबकि जीत तेजस्वी को राष्ट्रीय चेहरा बना सकती है।
जन सुराज की सफलता क्षेत्रीय दलों के पतन का संकेत देगी। प्रशांत किशोर की रणनीति अन्य राज्यों में नई पार्टियों को प्रेरित करेगी, जैसे पंजाब या यूपी में। प्रवासी मुद्दा राष्ट्रीय एजेंडा बनेगा, जो 2026 के तमिलनाडु या 2027 के यूपी चुनावों को प्रभावित करेगा।
कांग्रेस के लिए यह ‘एसडब्ल्यूओटी’ (स्ट्रेंथ्स, वीकनेसेस, ऑपर्चुनिटीज, थ्रेट्स) का परीक्षण है। यदि वे सीटें बढ़ाते हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती आएगी; अन्यथा, उनकी भूमिका और कमजोर हो जाएगी। कुल मिलाकर, यह चुनाव ‘तीन ध्रुवों’ वाली राजनीति की शुरुआत कर सकता है, जहां पारंपरिक गठबंधन टूटेंगे।
महिलाओं और युवाओं की भागीदारी से राजनीति अधिक समावेशी बनेगी। रिकॉर्ड वोटिंग सुझाव देती है कि बिहार ‘परिवर्तन’ की ओर बढ़ रहा है, जो राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करेगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: क्या BSP ‘तीसरा विकल्प’ बन रही है?
क्या बहुजन समाज पार्टी (BSP) तीसरा विकल्प बनकर उभर रही है? आइए तथ्यों से समझते हैं।
BSP की तैयारी: अकेले दम पर 243 सीटें
- मायावती ने जुलाई 2025 में ऐलान किया: बिना गठबंधन के सभी 243 सीटों पर लड़ेंगे।
- अब तक 130+ उम्मीदवारों की 3 लिस्टें जारी: दलित, OBC, मुस्लिम और पिछड़ों पर फोकस।
- हाई-प्रोफाइल टिकट: लालू के साले साधू यादव की पत्नी इंदिरा यादव (गोपालगंज), भोजपुरी सिंगर ओमप्रकाश दीवाना (मोहनिया)।
6 नवंबर से धमाकेदार शुरुआत: मायावती जी का कैंपेन:
- कैमूर (भभुआ) में पहली रैली: हजारों की भीड़, मायावती बोलीं – “ठीक-ठाक विधायक आए तो शर्तों के साथ सरकार में शामिल होंगे”।
- मुद्दे: प्रवासी मजदूरों का रोजगार, दलित-अल्पसंख्यक सशक्तिकरण, जंगलराज का डर।
- X पर वायरल: #बिहार_में_बसपा ट्रेंड, लोग कह रहे – “बसपा को एक मौका दो”।
प्लस पॉइंट: 2020 में 1 सीट जीती (जमा खान), कैमूर-रोहतास में पुराना गढ़। दलित वोट (खासकर रविदास/जाटव) BSP की ओर।
क्या हो सकता है परिणाम?
- बेस्ट केस: 10-15 सीटें → किंगमेकर। मायावती की शर्त: दलित CM डिप्टी या बड़ा मंत्रालय।
- वर्स्ट केस: 2-5 सीटें → वोट कटवा बनकर NDA को फायदा।
- एक्स फैक्टर: पहले चरण में महिलाओं-युवाओं की बंपर वोटिंग। अगर BSP ने 2-3% वोट MGB से काटे, तो कई सीटें पलट सकती हैं।
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